Thursday, December 10, 2009

ताज पर वार

संगीनों की छाया में पल रहा हैं आज
खूनी पंजो की जकड़न में छटपटा हैं आज
कल तक जिन आवाजों से गूँज रही थी घाटी
आज उसी कम्पन से सिहरा रही हैं मुंबई की माटी
स्टॉक एक्सचेंज और लोकल ट्रेन के बाद अब थी ताज की बारी
उच्च वर्ग को आतंकित करने की थी तैयारी |

अरबी लहरी थी जो जीवन का अंग
बना लिया हैं उसको आतंक की पतंग
पकिस्तान ने थामी हैं जो पतंग की डोर
मासूमों की भावनायों को कर रही हैं झकझोर |

बहुत हुआ ये खेल अब बंद करो आतंक का ये शोर
कहीं मोड़ना न पड़ जाये वर्तमान को सन ७१ की ओर ||






Friday, December 4, 2009

कविता की कविता

क्या हैं कविता
कवि के होठों कि इक बात हैं |
कभी लाती ख़ुशी और कभी गम कि बरसात हैं |
कविता की इक बात निराली हैं
न जाने कितने मतलब हैं इसके
ये बात खुद कवि ने भी न जानी हैं |
ज्यों बारिश की बूंदों से बुझती मिटटी की प्यास हैं
कविता के भावों से निकलती मन की भाड़ास हैं |
कागज़ पर केवल शब्दों का कोष नहीं हैं कविता
यह तो नीले आसमान में उडती पूंछियों की आवाज़ हैं |
कभी वीर रस और कभी शांत रस का सार हैं कविता
तो कभी मानवीय मूल्यों की बहती बहार हैं |
कभी प्रेमी के मुख की बात हैं कविता
तो कभी देश में भड़काती आग हैं |
क्या हैं कविता
कवि के होठों की इक बात हैं ||

मेरा प्रतिबिम्ब


इतिहास के आइने में जब देखता हूँ
तो पiता हूँ कि मेरा प्रतिबिम्ब बदल चुका हैं |
नहीं हैं वो पहले जैसी बात
नहीं रहे वो पहले जैसे हालात |
याद हैं मुख पर वो शर्म कि ओढनी
जिस पर बैठा करती थी मंद-मंद मुस्कान की मोरनी |
दिल में होते थे सुनहरे भविष्य के ख्याब
जिसको पूरा करने को यत्न होते थे बेहिसाब |
किया नहीं कोई उत्सव
सोचता था समय होगा बर्बाद
क्यूंकि पूरा करना था मुझे वो ख्याब |
पर आज जब देखता हूँ भविष्य में अपनी परछाई
तो पता हूँ कि खो गया हैं वो शख्स
जिसमे यत्नोंप्रांत नहीं मिलता था कोई नुख्स |
पर अब गल गयी हैं शर्म कि वो चादर
और वो हया हुई हैं बेपर्दा
जिसे देख शर्मा जाती थी खुद हया |
नहीं था जिसके जेहान में किसी मोहतरमा का जिक्र
अब दिन भर लगी रहती हैं उन्ही कि फ़िक्र |
ज्ञात हैं मुझे परिवर्तन हैं जीवन का सिद्धांत
परन्तु ये परिवर्तन नहीं अपवर्तन हैं जो शायद कर दे इस जीवन का अंत ||