Monday, January 21, 2013

अपना अपना रोना

कुछ यार बैठे है चौबारों  पे
जीते हुए जिंदगी उसके इशारों पे 
एक जैसे ही सपने है
और एक जैसी ही आशाएं
एक जैसा है लक्ष्य उनका
और एक जैसी ही समस्याएं
बचपन  बीता है उनका पढ़ पढ़ के
और प्रतिस्पर्धा में बीत रही है जवानी
मैडल पाए बक्से भर के
फिर भी अधूरी है जिंदगी की कहानी
रहती है हाथों को हाथों की तालाश
और आँखें ढूढ़ रही है आँखों को
उमड़ते है दिल में जज़्बात
पर कोई नहीं पास सुनाने को
क्यों होता है ऐसा
अक्सर उन विद्वानों के साथ
कहते है जिनको हम क्रीम देश की
करते है जिनकी प्रशंसा अगाथ
केवल एक मस्तिष्क नहीं ये हृदय भी है
जो रखते है प्रेम की आस 
सब सरिता झरनों से बस एक है बिनती
करो अब इनकी दूर ये प्यास ।।

Tuesday, January 15, 2013

कौन है तू
दूर देश में बसता एक परदेसी
या अपने वतन से रूठा एक स्वदेसी
क्या है तेरी पहचान
एक प्रसिद्ध विद्वान
या जिम्मेदारी से डरता एक नौजवान
क्या है ऐसा जो तुझे संकोचता है
अपनों को अपनाने से रोकता है
सब कुछ है तेरा
पर तू किसके लिए है
दूर तक देख ज़रा
आँखों में किसी की जलते आशा के दिये  है
आस लगाये बैठे है
वो अपने राम की
जलते दिलो के साथ
करते है इन्तजार दिवाली के शाम की
पर कैसी होली
और किसकी दिवाली
तुझको तो कुछ भी ध्यान नहीं
सूने और बिलखते चेहरों का
कुछ भी है संज्ञान नहीं
जा देख अक्स उस नीरव में
खुद को फिर से तू पायेगा
शेशव से यौवन का चित्रण
स्मृति पटल पर छा जायेगा
और पच्छिम की माया से विस्मृत
मन इस मिटटी में ही रम जायेगा ।।

Sunday, January 6, 2013

सूनी रातों से बाते करता हूँ उसकी
होठों की होठों से फ़रियादें करता हूँ उसकी
याद किया करते है उन चंद पालो को
जब वो थी पास हमारे
उनके लब से अपने लब तक
रहती थी उचह्यास हमारे
फिर से ढूंढ रहा हूँ उन प्रतिबिम्बों में
जिनमे खोयी थी परछाई उसकी
यत्नों पर तो दिख जाता  है चेहरा उनका
पर साथ में फिर से मिलती है केवल रुस्वायीं उनकी
दिन बीतें , बीतें है सालों
पर फिर भी न उनका इक भी  पैगाम मिला
करते हुए आस उसी की
खुद के हाथों में ही जाम मिला
कुछ करते है शिकवा उस खुदा से
और कुछ को है शिकायत हरि से
अब इन सबसे मैं क्या मांगूं
जब मिलते है इनकार परी से
खुद ही रोया , खुद को खोया
अब क्यां जीना ओ संसार यहाँ
शायद उस लोक मिल जाये
जिसकी कमी है यार यहाँ ।।

Saturday, January 5, 2013

एक औरत देखी थी मैंने
कुछ घबराई , कुछ सकुचाई
बैठा करती थी चूले पर
सबकी सुनती , कुछ न कहती
बस रोया करती  थी किस्मत पर अपनी
राखी पर भैया से प्यार
शादी पर पिया का हार
बस इतनी सी इच्छा थी उसकी
पर आंधी चली कि ऐसी इस सर्दी
कि सर का घूंघट उस पार गिरा
आँखों में काजल के बदले
आक्रोश  का अंगार भरा
तोड़ समाज की चार-दीवारी
अब निकल चुकी है ये नारी
144 क्या रोकेगा
यमुना  में उठे इस ज्वार को
अब तो जगना ही होगा
कम्बलों में सोयी इस सरकार को
बना कर कानून सुरक्षा का
करो अन्त इस हवस और व्यभिचार को
नहीं तो खो दोगे उन माँ बहनों को
जिसने सीचा है ढूध  से अपने सपनो जैसे इस संसार को ।।