Sunday, September 1, 2013

एक कमरा है मकान में
हल्के पीले रंग से पुती है दीवारें
दरवाजा तो नहीं बस एक झरोखा ही है
कांच सफ़ेद जड़ा है उसमे
पर उसकी चिटखनी अब खुलती नहीं है
शायद कुछ जंग लग गयी है
हर रोज देखता हूँ मैं बाहर इन्द्रधनुष को
और फिर अपनी हल्की पीली दीवारों को
न जाने क्यों वो दीवारें अब सफ़ेद सी जान पड़ती है
कभी-कभी झरोखे से मचलते दिल भी दिख जाते है
देखकर उन्हें सूनी निगाहें
ढूढने लगती है किसी को उस टूटे शीशे में
कुछ ज्यादा  दिखता तो नहीं है
शायद पानी कुछ ज्यादा हो जाता है
समझ नहीं आता
कमरे को बेदाग़ रखूं
या खिड़की के कांच को तोड़ दूँ
खुली हवा में श्यांस लूँ
या चार दिवारी में साँसों को ही छोड़ दूँ ॥

Monday, July 8, 2013

कुछ जगाती है कुछ सुलाती है
ऐसी ही इच्छायें होती है|
कुछ करती है इंद्री वश में
और कुछ इंद्री-वश हो जाती है
ऐसी ही इच्छायें होती है |
कुछ जलाती है द्वेष भाव में
कुछ देश प्रेम में जल जाती है
ऐसी ही इच्छायें होती है |
कभी करती है बन्दूक से  वार
कभी बंदूक का शिकार बनाती है 
ऐसी ही इच्छायें होती है |
किसी को कुर्सी से चिपकाती
किसी को कुर्सी छुडवाती
ऐसी ही इच्छायें होती है |
मन में बैठे-बैठे ही
मस्तिष्क पर लगाम लगाती है
ऐसी ही इच्छाएं होती है |
कुछ इच्छा से इच्छा बनती
और कुछ इच्छा समाज बनाती है
ऐसी ही इच्छाएं होती है ||

Sunday, June 9, 2013

रेत की मंजिल और अँधेरी है डगर
मधुमयी सलिल में लहरता कागज में भरा जहर
जोशीले है तन ,बेहोश है मन
धुएं के छल्लों में बंध कर रहा गया है ये यौवन
आँखें है लाल  ,पर न क्रोध है न ज्वाला
तपिश बची है इस सूरज में ,कहीं खो गया है उजाला
हाथ जो बोते थे गेहूँ कभी
अब बोतल ही थामे रहते है
कदम जो थिरकते थे ताल पर कभी
अब तो केवल गिरते पड़ते ही रहते है
(एक ही विनती है उन सब से )
कुछ लाज रखो उस पगड़ी की
जिसकी  भगत ,उधम से पहचान बढ़ी
अत्याचार और अनाचार से निरंतर एक संग्राम लड़ी ॥

Sunday, June 2, 2013

क्यूंकि बदलाव जरूरी है

काश कुछ बदला होता तब ही
वक्त बना था
दस्तूर रहा था
पर कुछ चूक हो गयी हमसे
गोरों के सिंहासन पर
बैठा दिए पुतले काली चमड़ी के
कहने को जनतंत्र  मिला था
फिर क्यों रही जनता गुलाम तभी भी
पांच साल में एक चुनाव
और समय चली मनमर्जी
बीते थे दो दशक अभी तो
जकड लिया कुछ पंजो ने फिर से
आपातकाल की रानी बनकर
 छीन लिए सब अधिकार सभी से
जेल प्रताड़ित ,नसबंदी पीडित
जनमानस में उबाल भरा
नारायण  के निर्देशन पर
संगठित होकर कुशासन से युद्ध लड़ा
यूँ तो परिणाम निकला जन हक़ में
पर वही चूक दोहराई हमने
रानी हट गयी ,राजा आया
पर न बदले हमने नियम खेल के
वही पांच साल में एक चुनाव
और समय वही मनमर्जी
भारत बदला
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार बढ़ा 
और साथ बड़ी टोपी की लूट
India shining की आस दिखाकर
किया कभी 2G  ,कभी CWG
भ्रष्टाचार से होकर त्रस्त
तभी हुआ फिर से हुंकार
आम आदमी का रूप ग्रहण कर
कृष्णा नहीं अर्जुन ने लिया है युद्ध प्रभार
कठिन है डगर
अंधकारमयी है प्रहर
न जाने फिर भी क्यूँ
अंतर में पनपी है एक आशा
बदलेगा आज
बदलेगा कल
इस भारतभूमि के जन जन का
बदलेगा अब तो जीवन सकल ॥

Sunday, March 24, 2013

Sunday, February 10, 2013

अब भी तलाश कुछ बाकी है ।

गालों के गड्ढो में मुस्कान की
नीली आँखों में छुपे अनजान की
ढेरों मुलाकातों में केवल उस एक बात की
और उसके अंतर मन में घुले उन जस्बात की
अब भी तलाश कुछ बाकी है ।

सूनी रातों के बदले केवल एक शाम की
टूटे दिल को आराम की
सोती-जागती  इच्छायों के अंजाम की
और अनंत अपेक्षायों के परिणाम की
अब भी तलाश कुछ बाकी है ।

Saturday, February 9, 2013

Monday, January 21, 2013

अपना अपना रोना

कुछ यार बैठे है चौबारों  पे
जीते हुए जिंदगी उसके इशारों पे 
एक जैसे ही सपने है
और एक जैसी ही आशाएं
एक जैसा है लक्ष्य उनका
और एक जैसी ही समस्याएं
बचपन  बीता है उनका पढ़ पढ़ के
और प्रतिस्पर्धा में बीत रही है जवानी
मैडल पाए बक्से भर के
फिर भी अधूरी है जिंदगी की कहानी
रहती है हाथों को हाथों की तालाश
और आँखें ढूढ़ रही है आँखों को
उमड़ते है दिल में जज़्बात
पर कोई नहीं पास सुनाने को
क्यों होता है ऐसा
अक्सर उन विद्वानों के साथ
कहते है जिनको हम क्रीम देश की
करते है जिनकी प्रशंसा अगाथ
केवल एक मस्तिष्क नहीं ये हृदय भी है
जो रखते है प्रेम की आस 
सब सरिता झरनों से बस एक है बिनती
करो अब इनकी दूर ये प्यास ।।

Tuesday, January 15, 2013

कौन है तू
दूर देश में बसता एक परदेसी
या अपने वतन से रूठा एक स्वदेसी
क्या है तेरी पहचान
एक प्रसिद्ध विद्वान
या जिम्मेदारी से डरता एक नौजवान
क्या है ऐसा जो तुझे संकोचता है
अपनों को अपनाने से रोकता है
सब कुछ है तेरा
पर तू किसके लिए है
दूर तक देख ज़रा
आँखों में किसी की जलते आशा के दिये  है
आस लगाये बैठे है
वो अपने राम की
जलते दिलो के साथ
करते है इन्तजार दिवाली के शाम की
पर कैसी होली
और किसकी दिवाली
तुझको तो कुछ भी ध्यान नहीं
सूने और बिलखते चेहरों का
कुछ भी है संज्ञान नहीं
जा देख अक्स उस नीरव में
खुद को फिर से तू पायेगा
शेशव से यौवन का चित्रण
स्मृति पटल पर छा जायेगा
और पच्छिम की माया से विस्मृत
मन इस मिटटी में ही रम जायेगा ।।

Sunday, January 6, 2013

सूनी रातों से बाते करता हूँ उसकी
होठों की होठों से फ़रियादें करता हूँ उसकी
याद किया करते है उन चंद पालो को
जब वो थी पास हमारे
उनके लब से अपने लब तक
रहती थी उचह्यास हमारे
फिर से ढूंढ रहा हूँ उन प्रतिबिम्बों में
जिनमे खोयी थी परछाई उसकी
यत्नों पर तो दिख जाता  है चेहरा उनका
पर साथ में फिर से मिलती है केवल रुस्वायीं उनकी
दिन बीतें , बीतें है सालों
पर फिर भी न उनका इक भी  पैगाम मिला
करते हुए आस उसी की
खुद के हाथों में ही जाम मिला
कुछ करते है शिकवा उस खुदा से
और कुछ को है शिकायत हरि से
अब इन सबसे मैं क्या मांगूं
जब मिलते है इनकार परी से
खुद ही रोया , खुद को खोया
अब क्यां जीना ओ संसार यहाँ
शायद उस लोक मिल जाये
जिसकी कमी है यार यहाँ ।।

Saturday, January 5, 2013

एक औरत देखी थी मैंने
कुछ घबराई , कुछ सकुचाई
बैठा करती थी चूले पर
सबकी सुनती , कुछ न कहती
बस रोया करती  थी किस्मत पर अपनी
राखी पर भैया से प्यार
शादी पर पिया का हार
बस इतनी सी इच्छा थी उसकी
पर आंधी चली कि ऐसी इस सर्दी
कि सर का घूंघट उस पार गिरा
आँखों में काजल के बदले
आक्रोश  का अंगार भरा
तोड़ समाज की चार-दीवारी
अब निकल चुकी है ये नारी
144 क्या रोकेगा
यमुना  में उठे इस ज्वार को
अब तो जगना ही होगा
कम्बलों में सोयी इस सरकार को
बना कर कानून सुरक्षा का
करो अन्त इस हवस और व्यभिचार को
नहीं तो खो दोगे उन माँ बहनों को
जिसने सीचा है ढूध  से अपने सपनो जैसे इस संसार को ।।