एक कमरा है मकान में
हल्के पीले रंग से पुती है दीवारें
हल्के पीले रंग से पुती है दीवारें
दरवाजा तो नहीं बस एक झरोखा ही है
कांच सफ़ेद जड़ा है उसमे
पर उसकी चिटखनी अब खुलती नहीं है
शायद कुछ जंग लग गयी है
हर रोज देखता हूँ मैं बाहर इन्द्रधनुष को
और फिर अपनी हल्की पीली दीवारों को
न जाने क्यों वो दीवारें अब सफ़ेद सी जान पड़ती है
कभी-कभी झरोखे से मचलते दिल भी दिख जाते है
देखकर उन्हें सूनी निगाहें
ढूढने लगती है किसी को उस टूटे शीशे में
कुछ ज्यादा दिखता तो नहीं है
शायद पानी कुछ ज्यादा हो जाता है
समझ नहीं आता
कमरे को बेदाग़ रखूं
या खिड़की के कांच को तोड़ दूँ
खुली हवा में श्यांस लूँ
या चार दिवारी में साँसों को ही छोड़ दूँ ॥