Saturday, February 11, 2012

जिंदगी के पन्ने कुछ इस तरह पूरे थे
जैसे महाप्रलय के मेघ बिन पानी के पूरे थे

आज अचानक से उन पर नज़र पड़ी है
धूमिल सी छवि फिर खिलखिला उठी है

उस खिलखिलाहट की आंधी में दिल कुछ ऐसा झूमा है
सावन के मौसम में मयूर नृत्य का बना नमूना है

अब तो दिल करता है
जी लूँ वो १२ अप्रैल की शाम
जब अंगुलियाँ थी keyboard पर
और Gtalk Screen पर था तुम्हारा नाम

कर्ण हुए थे सुन्न
भारी हो गया था मन
बाहर थी Gtalk की टन-टन
और अन्दर हो रहा था तीव्र हृदय स्पंदन

सुनहरे थे वो तीन शब्द
पारलौकिक थे वो पल
जैसे कामदेव क बाणों से
विस्मृत हो गया था जीवन सकल

परन्तु..... बहुत जल्दी ही बीत गयी वो शाम
और बीत चुकी है वो चंद रातें
बस रह गया है श्यामपट पर एक नाम
और बची हुई है उसकी कुछ सौगातें

अब इन सौगातें से ही अधूरेपन को भरना होगा
तो क्या हुआ जो भर न सका मांग उसकी
अब तो मेरी कब्र में उसको भी साथ मरना होगा ||