Saturday, April 28, 2018

वो पन्ने

काले  बादल और तेज हवा के बीच
अचानक वो पन्ने फिर खुल गए
धूल जमा हो गयी है उन पे
पर धीमी खुशबू अब भी है बाकी
गुलाबी स्याही से सजी हुई है अब तक वो झांकी
पानी से स्याही तो अब गीली हो रही है
शायद कुछ अक्षर भी धुल जाए
पर पानी इतना नहीं है कि कागज को घोल ले
साहस  इतना नहीं कि पन्ने को फाड़ दे
और अब तो किताब की सिलाई भी कमज़ोर हो चली है ||

Wednesday, October 18, 2017

डोनट वाली हैप्पी दिवाली

अक्सर भूल जाता हूँ कि त्यौहार क्या होता है
मौकों पर मिलने वाला उपहार क्या होता है |
फिर देखता हूँ सोशल चिड़िया कुछ तो चहचहा रही है
फोन की घंटी भी बड़ा टन टना रही है |
व्हाट्सप्प पर संदेसो की कुछ बाढ़ सी आयी है 
भीनी ही सही, पर यादो में कुछ मिठास सी आयी है |
शायद मिठास ये कुछ डोनट वाली है
खील-बताशे के बिना ही मन रही ये दिवाली है ||

Tuesday, October 10, 2017

Memories never die

The day we began the new journey of life
The day we started living each others dreams
The day when I felt warmth of your presence
The day I saw my image in your eyes
The day when I cherished that last moment
The day when you left me crying
Whatever be the situation
Whatever be the year
I will never forget the day
I will never let you forget the day

Sunday, February 12, 2017

कलम से वार्ता

पूछती है कलम , आज लिखाई में इतना गम क्यों है
मुस्काता चेहरा तो ठीक, पर पलके नाम क्यों है 
अरे हाथों में कम्पन , हृदय में तीव्र स्पंदन कैसा है
बीते वर्षो में क्या फिर कोई मिला उस जैसा है
(कलम को जवाब देते हुए )
तेरा क्या है , तू तो  हर रोज़ श्याही बदलता है
पर मेरा मन तो अब तक उस रुसवाई से डरता है
ये शक्ल तो अक्सर दुनिया को भ्रमती  है
पर आँखे तो अब तक केवल उसका ही पानी भरती है

Tuesday, March 31, 2015

सजदा किया करते थे हर शाम जिस खुशनुमा चेहरा का
खूबसूरत भूरी आँखें और उसपे पलकों के पहरे का |
जी करता है वो चाँद , कुछ इतना पास हो
जैसे भवरे को आकर्षित करती फूलों की मिठास हो||
बची कुछी जिंदगी कट रही थी ख्यालो में
हकीकत कर रही थी तार्रुफ केवल सवालो में ।
फिर हुआ अचानक कुछ ऐसा ,कि तार फिर छिड़ गया
अमावस की काली रातो में भी चाँद यूँ दिख गया ।
सुबह हुई तो लगा कि चलो छोडो … फिर से कोई सपना था
पर whatsapp की स्क्रीन पर दिखने वाला शायद कोई अपना था ।
कितना अपना और कितना बेगाना ,अरे यारो क्या है कोई पैमाना
या फिर से करना पड़ेगा जानने के लिए नयी मूवी का बहाना ?

Saturday, January 3, 2015

काश एक नया नंबर होता....

काश एक नया नंबर होता
कुछ कहता अपनी
कुछ सुनता उनकी
मुलाकातों की बातें होती
और बातों में मुलाकातें होती
बताती तुम दिन का हाल
और पूछती रूटीन सवाल
देर रात तक चलती हाँ-हूँ की कहानी
न होता तुमको होश
और ना रहता मेरे आँखों में पानी
फिर सुबह तुम कॉलेज के लिए फोन पर उठाती
और खुद फिर से सो जाती
यह सब होता
अगर नया नंबर होता

चलो कोई नहीं
अब कॉलेज तो बदल ही लिए है
और फ़ोन भी बहुत चतुरा गए है
तुम ना सही 
तुम्हारी आवाज़ के अलार्म की ही जिंदगी बना लिए है।