Tuesday, March 31, 2015

सजदा किया करते थे हर शाम जिस खुशनुमा चेहरा का
खूबसूरत भूरी आँखें और उसपे पलकों के पहरे का |
जी करता है वो चाँद , कुछ इतना पास हो
जैसे भवरे को आकर्षित करती फूलों की मिठास हो||
बची कुछी जिंदगी कट रही थी ख्यालो में
हकीकत कर रही थी तार्रुफ केवल सवालो में ।
फिर हुआ अचानक कुछ ऐसा ,कि तार फिर छिड़ गया
अमावस की काली रातो में भी चाँद यूँ दिख गया ।
सुबह हुई तो लगा कि चलो छोडो … फिर से कोई सपना था
पर whatsapp की स्क्रीन पर दिखने वाला शायद कोई अपना था ।
कितना अपना और कितना बेगाना ,अरे यारो क्या है कोई पैमाना
या फिर से करना पड़ेगा जानने के लिए नयी मूवी का बहाना ?

Saturday, January 3, 2015

काश एक नया नंबर होता....

काश एक नया नंबर होता
कुछ कहता अपनी
कुछ सुनता उनकी
मुलाकातों की बातें होती
और बातों में मुलाकातें होती
बताती तुम दिन का हाल
और पूछती रूटीन सवाल
देर रात तक चलती हाँ-हूँ की कहानी
न होता तुमको होश
और ना रहता मेरे आँखों में पानी
फिर सुबह तुम कॉलेज के लिए फोन पर उठाती
और खुद फिर से सो जाती
यह सब होता
अगर नया नंबर होता

चलो कोई नहीं
अब कॉलेज तो बदल ही लिए है
और फ़ोन भी बहुत चतुरा गए है
तुम ना सही 
तुम्हारी आवाज़ के अलार्म की ही जिंदगी बना लिए है।