Saturday, December 22, 2012

हजारो मील अपने वतन से दूर हूँ
पर फिर भी दर्द होता है मुझे
बढ़ गए है बलात्कार
बढ गयी है जात्तियाँ
उठे अगर आवाज़ तो मिलते है watercanon
और पड़ती है लाठियां
कैसा है ये न्याय
कैसी है ये व्यवस्थाये
आदमी कर रहा है शोषण
औरते सह रही है यातनायें
चिल्लाते है सब नेता
पर फिर भी सख्त कानून नहीं बनाता
कल कोई नेता न फस जाये इस बात से है घभराता
अब मैं दोष क्या दू इस संसद को
सारा समाज ही है  दूषित
अब पौरुषत्व के इस नंगेपन से आने लगी है घिन 
जहाँ 3 वर्ष  की बच्ची  नहीं है उस प्रताड़ित युवती  से भिन्न
यदि ऐसा ही भारत और इसके संस्कार
तो नहीं चहिहे ये देश
नहीं चहिहे इसकी मिटटी
सात समुन्दर पार ही अब
बनाऊंगा दोष मुक्त समाज और सुरक्षित सृष्टि









Saturday, September 15, 2012


सोचा था होगा नया देश
होंगे नए चेहरे 
उपलब्धियों के  बल पर बुनेगे सपने सुनहरे
सोचा था जीवन को नया उद्देश्य मिलेगा 
शेष हृदय को कोई विशेष मिलेगा
बने है नए मित्र 
हो रही है  नयी बातें 
फिर भी सूने है दिन 
और जागी हुई है रातें  
अब तक हर आवाज़ में रहती है उस आवाज़ की तलाश 
बाकी है हर चेहरे में उसकी एक झलक की आस 
श्वेत-अश्वेत चर्म से निर्मोही हो चुकी है मेरी भावना 
तुच्छ शरीर की नहीं 
अब तो है उस आत्मा की कामना
कदाचित  ही पूर्ण हो इस जन्म में मेरी यह वासना 
अतः करता हूँ उस शाश्वत से अंत की याचना ||

Monday, September 3, 2012

चेहरे में चेहरा था वो अजनबी 
रातों को दिखता था जो चाँद कभी-कभी |
अब वो चेहरा मेरे होठों के पास हैं 
जिसे चूमना मेरा बरसों का ख्याब हैं |
पर क्या करूँ मैं उसे शर्म सी आती हैं 
चाँद पर दाग न लग जाये इस बात से घबराती हैं |
अब कैसे समझाऊँ  मैं उसे इस चुम्बन पर मेरा अधिकार हैं 
हवस नहीं हैं जानम ये तो बरसो का प्यार हैं || 

Friday, May 11, 2012

नन्हे हाथों में आकाश की ऊँगली पकड़ कर 
चल पड़ा हूँ  मंजिल की ओर
सोचता हूँ एक दिन चाँद तोड़ लूँगा 
पागल उन हवाओं को शमशान मोड़ दूंगा
पर चलते चलते कुछ कांटा सा चुभा है 
और आँखों से कुछ मोती सा गिरा है 
काटों के डर से क्या चलना छोड़ दूँ 
श्रावण मेघ स्र्दश बरसना छोड़ दूँ 
 सीखा नहीं है  कदमो ने उलटे वापस जाना 
अगर  मुड़ गए युवा ही तो कौन बदलेगा जमाना ||

Saturday, February 11, 2012

जिंदगी के पन्ने कुछ इस तरह पूरे थे
जैसे महाप्रलय के मेघ बिन पानी के पूरे थे

आज अचानक से उन पर नज़र पड़ी है
धूमिल सी छवि फिर खिलखिला उठी है

उस खिलखिलाहट की आंधी में दिल कुछ ऐसा झूमा है
सावन के मौसम में मयूर नृत्य का बना नमूना है

अब तो दिल करता है
जी लूँ वो १२ अप्रैल की शाम
जब अंगुलियाँ थी keyboard पर
और Gtalk Screen पर था तुम्हारा नाम

कर्ण हुए थे सुन्न
भारी हो गया था मन
बाहर थी Gtalk की टन-टन
और अन्दर हो रहा था तीव्र हृदय स्पंदन

सुनहरे थे वो तीन शब्द
पारलौकिक थे वो पल
जैसे कामदेव क बाणों से
विस्मृत हो गया था जीवन सकल

परन्तु..... बहुत जल्दी ही बीत गयी वो शाम
और बीत चुकी है वो चंद रातें
बस रह गया है श्यामपट पर एक नाम
और बची हुई है उसकी कुछ सौगातें

अब इन सौगातें से ही अधूरेपन को भरना होगा
तो क्या हुआ जो भर न सका मांग उसकी
अब तो मेरी कब्र में उसको भी साथ मरना होगा ||