सोचा था होगा नया देश
होंगे नए चेहरे
उपलब्धियों के बल पर बुनेगे सपने सुनहरे
सोचा था जीवन को नया उद्देश्य मिलेगा
शेष हृदय को कोई विशेष मिलेगा
बने है नए मित्र
हो रही है नयी बातें
फिर भी सूने है दिन
और जागी हुई है रातें
अब तक हर आवाज़ में रहती है उस आवाज़ की तलाश
बाकी है हर चेहरे में उसकी एक झलक की आस
श्वेत-अश्वेत चर्म से निर्मोही हो चुकी है मेरी भावना
तुच्छ शरीर की नहीं
अब तो है उस आत्मा की कामना
कदाचित ही पूर्ण हो इस जन्म में मेरी यह वासना
अतः करता हूँ उस शाश्वत से अंत की याचना ||