बची कुछी जिंदगी कट रही थी ख्यालो में
हकीकत कर रही थी तार्रुफ केवल सवालो में ।
फिर हुआ अचानक कुछ ऐसा ,कि तार फिर छिड़ गया
अमावस की काली रातो में भी चाँद यूँ दिख गया ।
सुबह हुई तो लगा कि चलो छोडो … फिर से कोई सपना था
पर whatsapp की स्क्रीन पर दिखने वाला शायद कोई अपना था ।
कितना अपना और कितना बेगाना ,अरे यारो क्या है कोई पैमाना
या फिर से करना पड़ेगा जानने के लिए नयी मूवी का बहाना ?