नन्हे हाथों में आकाश की ऊँगली पकड़ कर
चल पड़ा हूँ मंजिल की ओर
सोचता हूँ एक दिन चाँद तोड़ लूँगा
पागल उन हवाओं को शमशान मोड़ दूंगा
पर चलते चलते कुछ कांटा सा चुभा है
और आँखों से कुछ मोती सा गिरा है
काटों के डर से क्या चलना छोड़ दूँ
श्रावण मेघ स्र्दश बरसना छोड़ दूँ
सीखा नहीं है कदमो ने उलटे वापस जाना
अगर मुड़ गए युवा ही तो कौन बदलेगा जमाना ||