Sunday, September 7, 2014

क्या लिखूं
फिर से शब्दों का जाल बुनू ,या अंतरमन का संज्ञान लूँ
खूब उलेटूं -पलेटूं हृदयँ में बसे पुराने प्रतिबिम्ब को
या माथे से दिल तक पहुंची आशा को अंजाम दूँ । 


चलो कुछ पुरानी बाते
फिर करूँगा आज की बात
हुआ करती थी सोच
एक दिल है तो दिलवाली तो बनती है
घर में नए मेहमानो की किलकारी तो बनती है
कुछ यूँ थे ख्याब , कुछ ऐसे थे ज़ज्बात
खुद को जीना, खुद के लिये मरना
हर मधु का करना था पान । 


फिर घटित हुआ क्या ऐसा बीते कुछ वर्षो में
खुद के खुदा का ध्यान होता रहा भंग
आप का जीवन में गहराने लगा रंग ।
तभी हुआ था अरविन्द या स्वराज से साक्षात्कार
चरम पर था अप्रविसियों में देश प्रेम का उदगार
प्रथम बार किया परिश्रम किसी और को कुछ दिलवाने का
दिसंबर 8 की शाम का मंजर पूरी दुनिया को दिखलाने का
कि कैसे 67 साल से कोंख में फसा गाँधी का भारत आज हुआ था पैदा
और कैसे धन-बाहु बल को आम आदमी ने था रौंदा । 


बस यूँ ही कटता जाए जीवन ,चुकता जाए उधार
माटी के ज्योतिर्लिंग पर चढ़ती जाए अनवरत देश प्रेम की यह धार ॥