Friday, December 17, 2010

कभी इसी जीवन में आई थी प्यार की परछाई
दुःख था कोसो दूर,खुशियाँ थी चारो तरफ छाई
और जिसने की थी हर शून्य की भरपाई |
सोचा न था हो जायेगा उस सम्बन्ध का अंत,
किया था जिसने इस स्थूल शरीर को जीवंत |
फिर सूनी हुई है जिंदगी एक अरसे के बाद
लगता है जैसे दूसरी मौत आ गयी,पहली मौत क बाद ||

Monday, August 9, 2010

घनघोर अँधेरा छाया है
मेघा भी साथ में लाया है |
लगता है अब तो कुछ बरसेगा
न अब कृषक जीवन अमृत को तरसेगा |
पर क्या हुआ जो ये बादल बिन बरसे ही लौट रहे
भेजा था जिनको इन्द्र देव ने ,अब सूर्य देव को ओड़ रहे |
क्या होगा अब किसान का, जो आशा की नज़रों से देख रहा
हर दिन,हर मास ,हर वर्ष को सूखे में बदलते देख रहा |
क्या कोई नहीं इस भारत में जो कृषक की पीड़ा हरे
दे वरदान सिचाई का उसके हर दुःख को संतृप्त करे ||

Tuesday, July 27, 2010

मेरी ओर भी देखो

क्या आप मुझे जानते है ? अगर नहीं तो शायद कुछ पलों में आप मुझे जानने और पहचानने लगे |
मैं एक छोटा बच्चा हूँ | अन्य शिशुयों की भांति मेरा जन्म भी अपनी माँ के गर्भ से हुआ परन्तु अन्य की भांति मेरे भाग्य में खिलोनों का सुख नहीं था वरन उस भाग्य निर्माता ने मुझे निर्माणाधीन इमारतो में बालू , मौरंग और गिट्टी के बीच छोड़ दिया और स्वयं वह मेरे शेशवकाल के पूर्ण होने की प्रतीक्षा करने लगा , क्यूंकि उसने शायद मेरे लिए कुछ और ही सोच रखा था |
शेशावावस्था पूर्ण होने पर उसने मुझे झूठे बर्तनों में बैठा दिया | चाय के झूठे गिलास और चटनी से सनी हुई तश्तरियों के अलावा मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा हैं | जिन हाथों में कलम की नीली स्याही लगी होनी चाहिए उनमें तो बस अब राख की कालिमा ही शेष रह गयी हैं | इतने पर भी उस निष्ठुर को दया नहीं आई और उसने मुझे फिर से उन्ही निर्माणाधीन इमारतो में भेज दिया जहाँ मेरा शेशवकाल बीता था | आज भी मैं उन दिनों को याद कर कुछ रहत की सांस लेता हूँ क्यूंकि कम से कम उस समय इन कन्धों पर ईट और पत्थर का भारी भोझ तो नहीं था |अपनी आयु के अन्य बालकों को देख कर मेरा भी मन करता हैं कि मेरे भी कन्धों पर बस्ता लटके ,शायद जिसका वजन इन ईट पत्थरों से तो कम हो|
अब तो आप मुझे पहचान ही गए होंगे कि मैं वहीँ हूँ जो एम. टी. से लेकर आपकी कैंटीनों में निरंतर सेवा में लगा रहता है | शायद मुझे और कुछ कहने की आवशयकता नहीं है और वो भी उस समाज के सम्मुख जो कदाचित इस देश के सभ्य और शिक्षित समाजों में से एक है ||



Thursday, January 21, 2010

मेरे ग़मगीन चेहरे पर एक ही चिंता है -काश मेरे भी स्वप्न वास्तविकता के आचल में खेल पते ,मैं भी सफलता के प्रकाश की किरण बन पता ,परन्तु हाय हाय !! ये किस्मत जो मुझे उस आंचल से दूर रखे हुए है | कहते है की परिश्रम ही सफलता की कुंजी हैं ,पर फिर क्यों यह एकलव्य अपने गंतव्य को प्राप्त करने में असमर्थ है | ऐसा क्यों होता है कि हर मोड़ में मुझे किस्मत कि ओर निहारना पड़ता हैं जो शायद मेरे लिए अब ईद का चाँद हो गयी हैं |
अपने चारो ओर उन साथियों कि सफलता से इर्ष्या होने लगी है जिनका किस्मत से चोली दामन का साथ है | न जाने कब मुझे उस अमावसी चाँद के दर्शन होंगे जो किस्मत का रूप धारण किये हुए हैं |हर एक असफलता मेरे आत्मबल को कम करती जा रही है| मेरी परिश्रमं करने कि भावना भी अब मृतप्राय हो चुकी है |
मेरा अंततः उस प्राकृत शक्ति से यही अनुरोध है कि सौभाग्य को जनमानस में ऐसे न बाटे कि कोई मेरी तरह अपना अंतिम श्रम करने को विवश हो जाये ||

Sunday, January 3, 2010

सफ़ेद

हर रंग कुछ कहता हैं | उन्ही रंगों में से एक रंग हैं- सफ़ेद | जिसे वैज्ञानिक दृष्टि से सभी रंगों का मिश्रित रूप कहा जा सकता हैं , जिसमे इन्द्रधनुष के सात रंग होते हैं | इसके अनुसार तो सफ़ेद रंग वह सब कुछ कह सकता हैं जो विभिन्न वर्ण व्यक्त करते हैं |
यदि हम अपने समाज का ही उदाहरण ले तो राजनेतायों की पोशाक से लेकर मृत्युशव का रंग भी सफ़ेद ही होता हैं | यह सत्य हैं की श्वेत वर्ण विभिन्न भावों को व्यक्त करता हैं पर यह तो सर्वथा अनुचित हैं कि सशक्त राजनेताओं की पोशाक के सफ़ेद रंग को सम्मान दिया जाये और एक विधवा को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाये |
जिस स्त्री के पति की मृत्यु हो जाती हैं उसका तो सफ़ेद रंग समाज में कलंकित समझा जाता हैं | वह श्वेत वर्ण शने: शने: कालिमा का ग्रास बनता चला जाता हैं | हम कहते हैं कि हम वैज्ञानिक युग में रह रहे हैं पर क्या हम विज्ञान को अपने जीवन में जी रहे हैं | हम उन दो वर्णों को समान बता रहे हैं जो कदाचित पूर्णत:भिन्न - भिन्न हैं , जहाँ एक ओर सफ़ेद सभी रंगों का सार हैं और वही काला रंग हैं रंगों कि अनुपस्थिति का द्योतक |
धन्य हैं भारतीय नारी जो लाल रंग क बाद इस सफ़ेद रंग को पाने जीवन में इतनी सहेजता से स्वीकार कर लेती हैं परंतु क्या यह हमारा सामाजिक दायित्व नहीं बनता हैं कि हम उसे सफ़ेद का सच को जीने दे | मेरे ये विचार प्राचीन भारतीय परंपरा के विरुद्ध नहीं हैं , पर शायद जो परंपरा ही दूषित हो गयी हो उसे आडम्बर समझ के परित्याग करने में ही व्यक्ति और समाज का कल्याण हैं ||