तो पiता हूँ कि मेरा प्रतिबिम्ब बदल चुका हैं |
नहीं हैं वो पहले जैसी बात
नहीं रहे वो पहले जैसे हालात |
याद हैं मुख पर वो शर्म कि ओढनी
जिस पर बैठा करती थी मंद-मंद मुस्कान की मोरनी |
दिल में होते थे सुनहरे भविष्य के ख्याब
जिसको पूरा करने को यत्न होते थे बेहिसाब |
किया नहीं कोई उत्सव
सोचता था समय होगा बर्बाद
क्यूंकि पूरा करना था मुझे वो ख्याब |
पर आज जब देखता हूँ भविष्य में अपनी परछाई
तो पता हूँ कि खो गया हैं वो शख्स
जिसमे यत्नोंप्रांत नहीं मिलता था कोई नुख्स |
पर अब गल गयी हैं शर्म कि वो चादर
और वो हया हुई हैं बेपर्दा
जिसे देख शर्मा जाती थी खुद हया |
नहीं था जिसके जेहान में किसी मोहतरमा का जिक्र
अब दिन भर लगी रहती हैं उन्ही कि फ़िक्र |
ज्ञात हैं मुझे परिवर्तन हैं जीवन का सिद्धांत
परन्तु ये परिवर्तन नहीं अपवर्तन हैं जो शायद कर दे इस जीवन का अंत ||
hey.. u r relly very nice...n i love ur poems...but dear kisi ladki ka lyf me ana end nhi start hoti hai.its a positive change.. :)
ReplyDeleteits worth writing ....nice one bro
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