Monday, August 9, 2010

घनघोर अँधेरा छाया है
मेघा भी साथ में लाया है |
लगता है अब तो कुछ बरसेगा
न अब कृषक जीवन अमृत को तरसेगा |
पर क्या हुआ जो ये बादल बिन बरसे ही लौट रहे
भेजा था जिनको इन्द्र देव ने ,अब सूर्य देव को ओड़ रहे |
क्या होगा अब किसान का, जो आशा की नज़रों से देख रहा
हर दिन,हर मास ,हर वर्ष को सूखे में बदलते देख रहा |
क्या कोई नहीं इस भारत में जो कृषक की पीड़ा हरे
दे वरदान सिचाई का उसके हर दुःख को संतृप्त करे ||

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