बीतें दिनों के साथ को इतिहास के आईने में ढूदने लगी है |
पर ये क्या हुआ जो आँखों में अब एक नहीं दो छवियाँ धुन्दली पाता हूँ
गुजरे कल और वर्तमान को लड़ते पाता हूँ
कौन सी है यह दूसरी तरंग जो पहले से अध्यारोपण कर रही है
और भूतकाल की छवि को धूमिल कर रही है
शायद यही है वो जो इस दर्द को चूर करेगी
और दिल में उठी इस टीस को अपने प्यार से काफूर करेगी ||
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