जिंदगी के पन्ने कुछ इस तरह पूरे थे
जैसे महाप्रलय के मेघ बिन पानी के पूरे थे
आज अचानक से उन पर नज़र पड़ी है
धूमिल सी छवि फिर खिलखिला उठी है
उस खिलखिलाहट की आंधी में दिल कुछ ऐसा झूमा है
सावन के मौसम में मयूर नृत्य का बना नमूना है
अब तो दिल करता है
जी लूँ वो १२ अप्रैल की शाम
जब अंगुलियाँ थी keyboard पर
और Gtalk Screen पर था तुम्हारा नाम
कर्ण हुए थे सुन्न
भारी हो गया था मन
बाहर थी Gtalk की टन-टन
और अन्दर हो रहा था तीव्र हृदय स्पंदन
सुनहरे थे वो तीन शब्द
पारलौकिक थे वो पल
जैसे कामदेव क बाणों से
विस्मृत हो गया था जीवन सकल
परन्तु..... बहुत जल्दी ही बीत गयी वो शाम
और बीत चुकी है वो चंद रातें
बस रह गया है श्यामपट पर एक नाम
और बची हुई है उसकी कुछ सौगातें
अब इन सौगातें से ही अधूरेपन को भरना होगा
तो क्या हुआ जो भर न सका मांग उसकी
अब तो मेरी कब्र में उसको भी साथ मरना होगा ||
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