चेहरे में चेहरा था वो अजनबी
रातों को दिखता था जो चाँद कभी-कभी |
अब वो चेहरा मेरे होठों के पास हैं
जिसे चूमना मेरा बरसों का ख्याब हैं |
पर क्या करूँ मैं उसे शर्म सी आती हैं
चाँद पर दाग न लग जाये इस बात से घबराती हैं |
अब कैसे समझाऊँ मैं उसे इस चुम्बन पर मेरा अधिकार हैं
हवस नहीं हैं जानम ये तो बरसो का प्यार हैं ||
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