Sunday, June 9, 2013

रेत की मंजिल और अँधेरी है डगर
मधुमयी सलिल में लहरता कागज में भरा जहर
जोशीले है तन ,बेहोश है मन
धुएं के छल्लों में बंध कर रहा गया है ये यौवन
आँखें है लाल  ,पर न क्रोध है न ज्वाला
तपिश बची है इस सूरज में ,कहीं खो गया है उजाला
हाथ जो बोते थे गेहूँ कभी
अब बोतल ही थामे रहते है
कदम जो थिरकते थे ताल पर कभी
अब तो केवल गिरते पड़ते ही रहते है
(एक ही विनती है उन सब से )
कुछ लाज रखो उस पगड़ी की
जिसकी  भगत ,उधम से पहचान बढ़ी
अत्याचार और अनाचार से निरंतर एक संग्राम लड़ी ॥

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