Thursday, December 10, 2009

ताज पर वार

संगीनों की छाया में पल रहा हैं आज
खूनी पंजो की जकड़न में छटपटा हैं आज
कल तक जिन आवाजों से गूँज रही थी घाटी
आज उसी कम्पन से सिहरा रही हैं मुंबई की माटी
स्टॉक एक्सचेंज और लोकल ट्रेन के बाद अब थी ताज की बारी
उच्च वर्ग को आतंकित करने की थी तैयारी |

अरबी लहरी थी जो जीवन का अंग
बना लिया हैं उसको आतंक की पतंग
पकिस्तान ने थामी हैं जो पतंग की डोर
मासूमों की भावनायों को कर रही हैं झकझोर |

बहुत हुआ ये खेल अब बंद करो आतंक का ये शोर
कहीं मोड़ना न पड़ जाये वर्तमान को सन ७१ की ओर ||






1 comment:

  1. hhmm...u r right///..i really appreciate ur views..n love them too... :)

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