खूनी पंजो की जकड़न में छटपटा हैं आज
कल तक जिन आवाजों से गूँज रही थी घाटी
आज उसी कम्पन से सिहरा रही हैं मुंबई की माटी
स्टॉक एक्सचेंज और लोकल ट्रेन के बाद अब थी ताज की बारी
उच्च वर्ग को आतंकित करने की थी तैयारी |
अरबी लहरी थी जो जीवन का अंग
बना लिया हैं उसको आतंक की पतंग
पकिस्तान ने थामी हैं जो पतंग की डोर
मासूमों की भावनायों को कर रही हैं झकझोर |
बहुत हुआ ये खेल अब बंद करो आतंक का ये शोर
कहीं मोड़ना न पड़ जाये वर्तमान को सन ७१ की ओर ||
hhmm...u r right///..i really appreciate ur views..n love them too... :)
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