Thursday, January 21, 2010

मेरे ग़मगीन चेहरे पर एक ही चिंता है -काश मेरे भी स्वप्न वास्तविकता के आचल में खेल पते ,मैं भी सफलता के प्रकाश की किरण बन पता ,परन्तु हाय हाय !! ये किस्मत जो मुझे उस आंचल से दूर रखे हुए है | कहते है की परिश्रम ही सफलता की कुंजी हैं ,पर फिर क्यों यह एकलव्य अपने गंतव्य को प्राप्त करने में असमर्थ है | ऐसा क्यों होता है कि हर मोड़ में मुझे किस्मत कि ओर निहारना पड़ता हैं जो शायद मेरे लिए अब ईद का चाँद हो गयी हैं |
अपने चारो ओर उन साथियों कि सफलता से इर्ष्या होने लगी है जिनका किस्मत से चोली दामन का साथ है | न जाने कब मुझे उस अमावसी चाँद के दर्शन होंगे जो किस्मत का रूप धारण किये हुए हैं |हर एक असफलता मेरे आत्मबल को कम करती जा रही है| मेरी परिश्रमं करने कि भावना भी अब मृतप्राय हो चुकी है |
मेरा अंततः उस प्राकृत शक्ति से यही अनुरोध है कि सौभाग्य को जनमानस में ऐसे न बाटे कि कोई मेरी तरह अपना अंतिम श्रम करने को विवश हो जाये ||

No comments:

Post a Comment