Sunday, April 17, 2011

ख्याब

हर रात सोचता हूँ
कब उस रात की सुबह होगी
आँखों में बसे है जो स्वप्न ,उनकी फतह होगी |
फिर भी हर रात ख्यालों में कट जाती है
और सुबह होते ही एक धूमिल सी छवि याद आती है |
अरे अब तो धीरे-धीरे उस छवि से धुल भी हटने लगी है
फिर से दिल में एक प्यार की कलि खिलने लगी है |
कैसे समझाउं इस दिल को ,हर स्वप्न सत्य नहीं होता
किसी दूरदर्शी से चाँद पर अधिपत्य नहीं होता ||

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