Saturday, April 28, 2018

वो पन्ने

काले  बादल और तेज हवा के बीच
अचानक वो पन्ने फिर खुल गए
धूल जमा हो गयी है उन पे
पर धीमी खुशबू अब भी है बाकी
गुलाबी स्याही से सजी हुई है अब तक वो झांकी
पानी से स्याही तो अब गीली हो रही है
शायद कुछ अक्षर भी धुल जाए
पर पानी इतना नहीं है कि कागज को घोल ले
साहस  इतना नहीं कि पन्ने को फाड़ दे
और अब तो किताब की सिलाई भी कमज़ोर हो चली है ||

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