Tuesday, July 27, 2010

मेरी ओर भी देखो

क्या आप मुझे जानते है ? अगर नहीं तो शायद कुछ पलों में आप मुझे जानने और पहचानने लगे |
मैं एक छोटा बच्चा हूँ | अन्य शिशुयों की भांति मेरा जन्म भी अपनी माँ के गर्भ से हुआ परन्तु अन्य की भांति मेरे भाग्य में खिलोनों का सुख नहीं था वरन उस भाग्य निर्माता ने मुझे निर्माणाधीन इमारतो में बालू , मौरंग और गिट्टी के बीच छोड़ दिया और स्वयं वह मेरे शेशवकाल के पूर्ण होने की प्रतीक्षा करने लगा , क्यूंकि उसने शायद मेरे लिए कुछ और ही सोच रखा था |
शेशावावस्था पूर्ण होने पर उसने मुझे झूठे बर्तनों में बैठा दिया | चाय के झूठे गिलास और चटनी से सनी हुई तश्तरियों के अलावा मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा हैं | जिन हाथों में कलम की नीली स्याही लगी होनी चाहिए उनमें तो बस अब राख की कालिमा ही शेष रह गयी हैं | इतने पर भी उस निष्ठुर को दया नहीं आई और उसने मुझे फिर से उन्ही निर्माणाधीन इमारतो में भेज दिया जहाँ मेरा शेशवकाल बीता था | आज भी मैं उन दिनों को याद कर कुछ रहत की सांस लेता हूँ क्यूंकि कम से कम उस समय इन कन्धों पर ईट और पत्थर का भारी भोझ तो नहीं था |अपनी आयु के अन्य बालकों को देख कर मेरा भी मन करता हैं कि मेरे भी कन्धों पर बस्ता लटके ,शायद जिसका वजन इन ईट पत्थरों से तो कम हो|
अब तो आप मुझे पहचान ही गए होंगे कि मैं वहीँ हूँ जो एम. टी. से लेकर आपकी कैंटीनों में निरंतर सेवा में लगा रहता है | शायद मुझे और कुछ कहने की आवशयकता नहीं है और वो भी उस समाज के सम्मुख जो कदाचित इस देश के सभ्य और शिक्षित समाजों में से एक है ||



1 comment:

  1. i see them too but wonder what is possible for us to do :(

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