Sunday, January 6, 2013

सूनी रातों से बाते करता हूँ उसकी
होठों की होठों से फ़रियादें करता हूँ उसकी
याद किया करते है उन चंद पालो को
जब वो थी पास हमारे
उनके लब से अपने लब तक
रहती थी उचह्यास हमारे
फिर से ढूंढ रहा हूँ उन प्रतिबिम्बों में
जिनमे खोयी थी परछाई उसकी
यत्नों पर तो दिख जाता  है चेहरा उनका
पर साथ में फिर से मिलती है केवल रुस्वायीं उनकी
दिन बीतें , बीतें है सालों
पर फिर भी न उनका इक भी  पैगाम मिला
करते हुए आस उसी की
खुद के हाथों में ही जाम मिला
कुछ करते है शिकवा उस खुदा से
और कुछ को है शिकायत हरि से
अब इन सबसे मैं क्या मांगूं
जब मिलते है इनकार परी से
खुद ही रोया , खुद को खोया
अब क्यां जीना ओ संसार यहाँ
शायद उस लोक मिल जाये
जिसकी कमी है यार यहाँ ।।

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