Tuesday, January 15, 2013

कौन है तू
दूर देश में बसता एक परदेसी
या अपने वतन से रूठा एक स्वदेसी
क्या है तेरी पहचान
एक प्रसिद्ध विद्वान
या जिम्मेदारी से डरता एक नौजवान
क्या है ऐसा जो तुझे संकोचता है
अपनों को अपनाने से रोकता है
सब कुछ है तेरा
पर तू किसके लिए है
दूर तक देख ज़रा
आँखों में किसी की जलते आशा के दिये  है
आस लगाये बैठे है
वो अपने राम की
जलते दिलो के साथ
करते है इन्तजार दिवाली के शाम की
पर कैसी होली
और किसकी दिवाली
तुझको तो कुछ भी ध्यान नहीं
सूने और बिलखते चेहरों का
कुछ भी है संज्ञान नहीं
जा देख अक्स उस नीरव में
खुद को फिर से तू पायेगा
शेशव से यौवन का चित्रण
स्मृति पटल पर छा जायेगा
और पच्छिम की माया से विस्मृत
मन इस मिटटी में ही रम जायेगा ।।

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