Monday, January 21, 2013

अपना अपना रोना

कुछ यार बैठे है चौबारों  पे
जीते हुए जिंदगी उसके इशारों पे 
एक जैसे ही सपने है
और एक जैसी ही आशाएं
एक जैसा है लक्ष्य उनका
और एक जैसी ही समस्याएं
बचपन  बीता है उनका पढ़ पढ़ के
और प्रतिस्पर्धा में बीत रही है जवानी
मैडल पाए बक्से भर के
फिर भी अधूरी है जिंदगी की कहानी
रहती है हाथों को हाथों की तालाश
और आँखें ढूढ़ रही है आँखों को
उमड़ते है दिल में जज़्बात
पर कोई नहीं पास सुनाने को
क्यों होता है ऐसा
अक्सर उन विद्वानों के साथ
कहते है जिनको हम क्रीम देश की
करते है जिनकी प्रशंसा अगाथ
केवल एक मस्तिष्क नहीं ये हृदय भी है
जो रखते है प्रेम की आस 
सब सरिता झरनों से बस एक है बिनती
करो अब इनकी दूर ये प्यास ।।

No comments:

Post a Comment